HBSE Class 12 Hindi Important Questions 2021 – वितान भाग 2

HBSE Class 12 Hindi Important Questions and Answers for 2021 Exams. Here i added all the Important Questions of Vitan Bhag -2 from Class 12 Hindi. As you Know Haryana Board as well as other boards like CBSE Changed their Syllabus for 2021 Exams due to study is not performed well. Now HBSE changed class 12 Hindi Syllabus also . So Here i added all Important Questions after changing in Syllabus. Some Chapters has deleted so your important questions from वितान भाग 2 is changed also. HBSE Paper Pattern is not changed more but Chapters reduced. here i Provided all the Important Questions of Class 12 Hindi 2020-21 with Chapter wise.

Class 12 Hindi Important Questions 2021

पाठ 1 सिल्वर वेडिंग महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. यशोधर बाबू की पत्नी समय के साथ ढल सकने में सफल होती है, लेकिन यशोधर बाबू असफल रहते हैं। ऐसा क्यों?

उत्तर – यशोधर बाबू सचिवालय में सेक्शन ऑफिसर हैं। वे अपने काम के प्रति सचेत एवं समय के पाबंद हैं। काम के समय वे अपने सह कर्मचारियों के साथ गंभीर व्यवहार करते हैं जबकि छुट्टी के बाद उनके साथ दोस्तों की तरह व्यवहार करते हैं। ये सभी आदर्श एवं संस्कार उन्हें अपने आदर्श कृष्णानंद से मिले हैं जिन्हें यशोधर आदर से किशनदा कहकर पुकारते हैं। किशन के संस्कारों और आपसी व्यवह ने यशोधर बाबू को गहरा प्रभावित किया है वे प्रत्येक बात किशनदा के नजरिये से देखते हैं। दूसरी ओर यशोधर बाबू की पत्नी अपने बच्चों के दृष्टिकोण से सहमत होने के कारण उनका साथ देती है। वह उन्हीं के साथ अधिक समय व्यतीत करती है। यह अपनी दबी सारी इच्छाओं को अपनी बेटी तथा बेटों के माध्यम से पूर्ण करना चाहती है। इसीलिए उसे बेटी द्वारा जिन्स तथा बिना बाजू का टोप पहनना बुरा नहीं लगता। इसके लिए वह अपने पति का भी विरोध करती है। किशनदा से प्रभावित होकर यशोधर बाबू भी घर नहीं बनवाते हैं। उन्हें यह बात बिल्कुल भी पसंद नहीं आती कि उनके बच्चे उनकी सालगिरह को ‘सिल्वर वैडिंग’ के रूप में मनाएं। वे इस आयोजन को फिजूलखर्ची मानते हैं। उनके बच्चे यशोधर बाबू के इसी दृष्टिकोण से सहमत नहीं हैं।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि यशोधर बाबू अपने आदर्श किशनदा से अधिक प्रभावित है और आधुनिक परिवेश में बदलते जीवन मूल्यों और संस्कारों के विरुद्ध हैं जबकि उनकी पत्नी अपने बच्चों के साथ आधुनिक परिवेश में ढल चुकी है इसलिए यशोधर बाबू की पत्नी समय के साथ ढल सकने में सफल होती है लेकिन यशोधर बाबू असफल रहते हैं।

प्रश्न 2. निम्नलिखित में से किसे आप कहानी की मूल संवेदना कहेंगे/कहेंगी और क्यों ? (क) हाशिए पर धकेले जाते मानवीय मूल्य, (ख) पीढ़ी अंतराल, (ग) पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव।
अथवा
‘सिल्वर वैडिंग’ में प्रतिपादित पीढ़ी के अंतराल पर प्रकाश डालिए।

उत्तर – ‘सिल्वर वैडिंग’ सुप्रसिद्ध कथाकार ‘मनोहर श्याम जोशी’ द्वारा रचित एक संवेदनशील कहानी है। इस कहानी में अपने आदर्श किशनदा के संस्कारों और जीवन मूल्यों से जुड़े यशोधर बाबू और उनके आधुनिक परिवेश में बड़े हो रहे बच्चों की नई सोच में अंतर को चित्रित किया गया है। उपर्युक्त प्रश्नों में तीन मुख्य बातों को दर्शाया गया है। अगर यह कहें कि इन बातों का ही मिश्रण प्रस्तुत कहानी की मूल संवेदना है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कहानी में यह बात पूर्णतः सत्य है कि आधुनिक पीढ़ी मानवीय मूल्यों को ताक पर रख रही है। वह केवल अपने तरीके से सोचती है फिर चाहे उनके परिवार के अन्य सदस्य उनसे कितने ही असंतुष्ट ही क्यों न हों। दोनों पीढ़ियों के बीच अंतराल भी मूल हो सकता है और पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव भी कहीं-न-कहीं नयी पीढ़ी को प्रभावित करता है। लेकिन फिर भी अगर किसी एक बिंदु पर ध्यान आकर्षित किया जाये या किसी एक बिंदु को ही कहानी की कहा जाए तो निश्चित रूप से पीढ़ी अंतराल ही इस कहानी की मूल संवेदना ही है। मूल संवेदना कहानी के संपूर्ण कथानक का अगर अवलोकन किया जाए तो यह कथन अधिक संगत होगा कि यशोधर बाबू पुरानी पीढ़ी के पक्षधर हैं और उनके बच्चे नयी पीढ़ी के प्रतिनिधि के रूप में सामने आते हैं। यह कथन भी सही हो सकता है कि यशोधर बाबू की सोच बीवी बच्चों की सोच से मेल नहीं खाती, परंतु कुछ बातें यशोधर बाबू केवल किशनदा के दृष्टिकोण से सोचते हैं जो समय परिवर्तन के साथ अप्रसांगिक हो गयी हैं जैसे यशोधर बाबू किशनदा से प्रभावित होकर घर नहीं बनाते जबकि उनके सभी सहकर्मियों ने अपने अपने घर बना रखे हैं इसलिए उनके बच्चों का यह कहना कि आपने डी० डी० ए० को स्कीम के अनुसार अपना पर क्यों नहीं बनवाया, एक प्रश्न हो सकता है। यशोधर बाब की बेटी अभी विवाह नहीं करना चाहती है बल्कि अपना करियर बनाना चाहती है परंतु यशोधर बाबू को यह बात अखरती है। वे चाहते हैं कि बेटी का विवाह करके वे जल्दी से अपने कर्तव्य को पूरा करके छुट्टी पायें। अगर छोटी मेडिकल की पढ़ाई करके अपना भविष्य अधिक उज्वल एवं सुरक्षित करना चाहती है तो यशोधर बाबू को बजाए इसका विरोध करने के बेटी का साथ देना चाहिए क्योंकि जब वह जीवन में सफल हो जाएगी ठो उसके लिए रिश्तों की कोई कमी नहीं रहेगी। इसलिए यशोधर बाबू का केवल कर्तव्य के लिए इतनी जल्दी करना बेटी के भविष्य के साथ एक खिलवाड़ हो सकता है।
दूसरी नौकरी पेशा बेटे भूषण के द्वारा पिता की ‘सिल्वर वैडिंग’ पर ऊनी हरैसिंग को गिफ्ट देकर यह कहना कि “आप सवेरे जब दूध लेने जाते हैं बब्बा, फटा फुलोवर पहन कर चले जाते हैं जो बहुत ही बुरा लगता है। आप इसे पहनकर जाया कीजिए।” यह बात यशोधर बाबू को और भी बुरी लगती है कि बेटा यह कहता है कि पिता जी कल से दूध में लेकर आया करुंगा। अंततः यह कहना अधिक तर्कसंगत होगा कि पीढ़ी अंतराल के कारण यशोधर बाबू अपने अनुसार सोचते हैं जबकि उनके बच्चे नयी पीढ़ी की सोच के अनुसार व्यवहार करते हैं। इसलिए इस कहानी की मूल संवेदना ‘पीढ़ी अंतराल’ है।

प्रश्न 3. दिल्ली आने पर यशोधर बाबू की सहायता किसने की और कैसे ?

उत्तर – दिल्ली आने पर यशोधर बाबू की सहायता किशनदा ने की किशनदा ने यशोधर बाबू को रहने के लिए क्र्वाटर ही नहीं दिया बल्कि उसे मैस में रसोइया बनाकर भी रख लिया। उन्होंने यशोधर को पचास रुपए उधार दिए ताकि
वह अपने लिए कपड़े बनवा सके तथा अपने गाँव पैसा भेज सके। इसके बाद नौकरी की उम्र होने पर किशनदा ने उन्हें अपने दफ्तर में अपने नीचे नौकरी पर लगवा दिया।

प्रश्न 4. यशोधर बाबू के बच्चों को अपने पिता से क्या शिकायत थी ?

उत्तर – यशोधर बाबू प्राचीन मूल्यों एवं विचारों के आदमी थे उन्हें लोक दिखावा तथा भोड-भाड पसंद नहीं थी किंतु उनके बच्चे आधुनिक विचारों के थे। उन्हें पार्टी समारोह आदि करना अच्छा लगता था। उन्होंने अपने पिता की सिलवर वैडिंग का आयोजन किया और वहाँ बड़े-बड़े लोगों को बुलाया। परंतु उनके पिता वहाँ नहीं आए। उनके बच्चों को यही शिकायत थी कि वे केवल एल० डी० सी० टाइप लोगों से मिलते-जुलते हैं।

पाठ 2 जूझ महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर 

प्रश्न 1. स्वयं कविता रच लेने का आत्मविश्वास लेखक के मन में कैसे पैदा हुआ?

उत्तर – लेखक जब पांचवीं कक्षा के विद्यार्थी थे तब उनकी कक्षा में सौंदलगेकर नामक अध्यापक मराठी पदाटे थे। पढ़ाते समय वे स्वयं कविता में पूरी तरह से डूब जाते थे। उनका गला सुरीला था तथा छंद बनाने की बढ़िया चाल भी थी। मराठी के साथ उन्हें अंग्रेजी की अनेक कविताएं कंठस्थ थीं। वे कविता को गाते समय लय, गति, यति और ताल का बखूबी प्रयोग करते थे। लेखक जब उनसे कविता सुना करते थे तो वे भी कविता के भावों में पूरी तरह से रम जाते थे। वे मास्टर जी के हाव-भाव, ध्वनि, ताल, रस और चाल को पूरी तल्लीनता वे काव्य में पूरी रुचि लेने लगे। साथ सुना करते थे। वहीं से वे वाक्य में पूरी रुचि लेने लगे।
जब वे खेतों में काम करते थे उस समय मास्टर की भांति पूरे हाव-भाव, यति-गति और आरोह-अवरोह के अनुसार कविता गाया करते थे जिस प्रकार मास्टर जी अभिनय करते थे वे उसी प्रकार अभिनय किया करते थे। कविता गाते समय उन्हें यह भी पता नहीं चलता था कि क्यारियाँ पानी से कब भर गईं। मास्टर जी भी आनंद के कविता गाने में रुचि लेने लग गए थे। उन्होंने बड़ी कक्षा के बच्चों के सामने आनंद को कविता सुनाने के लिए कहा और आनंद ने इस अवसर का खूब फायदा उठाया। अब वे अपने आसपास, अपने गाँव और खेतों के दृश्यों की कविता बनाने लगे। भैंस चराते आगते जंगली फूलों पर तुकबंदी करने लगे। जब रविवार के दिन कोई कविता बन जाती तो अगले दिन मास्टर जी को दिखाता और सुनाता। मास्टर जी उन्हें शाबाशी देते। मास्टर जी ने उन्हें भाषा शैली, छंद, अलंकारों के साथ-साथ शुद्ध लेखन की बारीकियों सिखा दीं। वे उन्हें अलग-अलग प्रकार की कविताओं के संग्रह देते थे। इस प्रकार लगातार अभ्यास में वे मराठी में कविताएं लिखने लगे। उन पर कविता लिखते समय शब्दों का नशा चढ़ने लगा इस प्रकार लेखक के में स्वयं कविता रच लेने का आत्मविश्वास पैदा हुआ।

प्रश्न 2. श्री सौंदलगेकर के अध्यापन की उन विशेषताओं को रेखांकित करें, जिन्होंने कविताओं के प्रति लेखक के मन में रुचि जगाई।
अथवा
श्री सौंदलगेकर के अध्यापन की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर – श्री सौंदलगेकर के अध्यापन की निम्नलिखित विशेषताएं हैं जिन्होंने कविताओं के प्रति लेखक के मन में रुचि जगाई
1. श्री सौंदलगेकर कविता के अध्यापन के साथ कविता गाया भी करते थे।
2. वे गायन के साथ-साथ हाव-भाव के अनुसार अभिनय भी किया करते थे।
3. वे कविता को गाते समय लय, यति, गति, ताल का पूर्ण ध्यान रखते थे।
4. वे कविता के साथ-साथ उनके कवियों से अपनी मुलाकात के संस्मरण भी सुनाया करते थे।
5. वे कभी-कभी स्वरचित कविता भी कक्षा में सुनाया करते थे।

प्रश्न 3. कविता के प्रति लगाव से पहले और उसके बाद अकेलेपन के प्रति लेखक की धारणा में क्या बदलाव आया?

उत्तर – मास्टर सौंदलगेकर लेखक की पांचवीं कक्षा में मराठी पढ़ाते थे। वे कविता पढ़ाते समय स्वयं भी उसमें डूब जाते थे। उनके पास सुरीला गला और छंद का ज्ञान था। उन्हें मराठी के साथ-साथ अंग्रेजी की भी कुछ कविताएं कंठस्थ थी। जब वे कविता सुनाते थे तब साथ-साथ अभिनय भी किया करते थे। लेखक उनकी कविताएं पूरी तल्लीनता से सुनते थे। वे अपनी आँखों और कानों की पूरी शक्ति लगाकर दम रोककर मास्टर जी के हाव-भाव, ध्वनि, यति, गति, चाल और रसों का स्वादन किया करते थे।
लेखक खेतों में पानी लगाते समय खुले गले से मास्टर जी के हाव-भाव और आरोह-अवरोह के अनुसार कविताएँ गाया करते थे। जिस प्रकार मास्टर जी अभिनय करते थे उसी प्रकार लेखक भी अभिनय करते थे इस प्रकार लेखक भी कविताओं के साथ खेलने लगे। इन कविताओं के माध्यम से लेखक में नई रुचियां पैदा होने लगीं। पहले जब वे खेतों में पानी लगाते थे उस समय उन्हें अकेलापन खटकता था। अगर काम करते समय कोई साथ नहीं है तो उन्हें बोरियत होती थी, इसलिए कोई-न-कोई साथ होना चाहिए। लेकिन कविता के प्रति लगाव होने के पश्चात् उन्हें अकेलापन नहीं खटकता था। बल्कि अब उन्हें अकेलेपन अच्छा लगता था क्योंकि अकेलेपन में कविता ऊंची आवाज़ में गाई जा सकती थी। कविता के भाव के अनुसार अभिनय भी किया जा सकता था। लेखक अब कविता गाते-गाते नाचने भी लगा था। इस प्रकार कविता के प्रति लगाव ने लेखक की अकेलेपन की धारणा को बदल दिया।

प्रश्न 4. ‘जूझ’ पाठ का मुख्य भाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – जूझ का शाब्दिक अर्थ है-‘संघर्ष’। इस पाठ में लेखक ने एक बच्चे की पाटशाला जाने की इच्छाशक्ति तथा इच्छापूर्ति के लिए संघर्ष का चित्रण किया है। इसमें लक्ष्य प्राप्ति के लिए जीवन-संघर्ष की गाथा का वर्णन है। यहां कथानायक के जीवन के संघर्षों का मार्मिक चित्रांकन किया है। जो अपनी कोमलावस्था से निरंतर संघर्ष करता रहता है।

प्रश्न 5. लेखक का अकेलापन कैसे गायब हो गया ?

उत्तर – लेखक अपने अकेलेपन में कविताओं को लय, ताल, छंद, यति-गति के साथ गाया करता। वह बहुत ऊंची
आवाज में गाकर अभिनय करने लगा था वह कविता गाते-गाते शुई-मुई करके नाचने लगता था उन्होंने अनेक कविताओं को स्वयं की चाल में गाना शुरू कर दिया। इस प्रकार लेखक का अकेलापन गायब हो गया।

पाठ 3 अतीत में दबे पांव महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. सिंधु-सभ्यता साधन-संपन्न थी, पर उसमें भव्यता का आडंबर नहीं था कैसे ?

उत्तर – लेखक ‘ओम थानवी’ ने अपनी यात्रा के समय जब सिंधु घाटी की सभ्यता से जुड़े दो महानगरों मोहनजोदड़ो और हड़प्पा के घरों, गलियों, सड़कों और खुदाई में वास्तुशिल्प से जुड़े सामान को देखा तो यह निष्कर्ष निकाला कि अगर सिंधु घाटी की सभ्यता के साथ विश्व की अन्य सभ्यताओं की तुलना की जाए तो सिंधु घाटी की सभ्यता साधन संपन्न थी उसमें कृत्रिमता एवं ऑर्डर नहीं था। इस निष्कर्ष स्वरूप उन्होंने कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये जो इस प्रकार हैं- जब मोहनजोदड़ो स्थित एक छोटा-सा संग्रहालय देखने गए तो वहाँ उन्होंने एक अलग बात अनुभव की कि इस संग्रहालय में औजार तो हैं परंतु हथियार कोई नहीं है। अगर सिंधु से लेकर हरियाणा तक खुदाई में मिले अवशेषों पर गौर किया जाए तो हथियार कहीं भी नहीं हैं। जिस प्रकार प्रत्येक राजा के पास हथियारों की एक बड़ी खेप होती है परंतु यहाँ हथियार नाम की चीज नहीं है। पुरातात्विक विद्वानों के लिए यह बड़ा प्रश्न है कि सिंधु सभ्यता में शासन और सामाजिक प्रबंध के तौर-तरीके क्या रहे होंगे? यहाँ की सभ्यता में अनुशासन तो है परंतु किसी सत्ता के बल के द्वारा नहीं है। यह अनुशासन वहाँ की नगर योजना, वास्तुकला, मुहरों, ठप्पों, जल-व्यवस्था, साफ़-सफाई और सामाजिक व्यवस्था आदि की एकरूपता में देखी जा सकती है। दूसरी सभ्यताओं में प्रशासन राजतंत्र और धर्मतंत्र द्वारा संचालित है। वहाँ बड़े-बड़े सुंदर महल, पूजा स्थल, भव्य मूर्तियां, पिरामिड और मंदिर मिले हैं। राजाओं और धर्माचार्यों की समाधियाँ भी दूसरी सभ्यताओं में भरपूर मात्रा में मौजूद हैं। सिंधु घाटी सभ्यता की खुदाई में छोटी-छोटी नावें मिली हैं जबकि मिस्र की सभ्यता में बड़ी नावों का प्रचलन था। सांस्कृतिक धरातल पर यह तथ्य सामने आता है कि सिंधु घाटी की सभ्यता दूसरी सभ्यताओं से अलग एवम् स्वाभाविक, साधारण जीवन-शैली पर आधारित थी। सिंधु सभ्यता के सामाजिक, धार्मिक एवम् सांस्कृतिक जीवन में किसी प्रकार की कृत्रिमता एवं आडंबर दिखाई नहीं पड़ता जबकि अन्य सभ्यताओं में राजतंत्र और धर्मतंत्र की ताकत को दिखाते अनेक प्रमाण मौजूद हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि सिंधु सभ्यता संपन्न थी परंतु उसमें भव्यता का आडंबर नहीं था।

प्रश्न 2. सिंधु-सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य-बोध है जो राजपोषित या धर्मपोषित न होकर समाज-पोषित था। ऐसा क्यों कहा गया?

उत्तर – सिंधु सभ्यता की सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियाँ और प्रवृत्तियाँ मानवता पर आधारित हैं। सिंधु सभ्यता मानव निर्मित और मानव आधारित है। सिंधु घाटी की खुदाई से मिले अवशेषों और खंडहरों को देखकर यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि सिंधु सभ्यता के लोग साधारण जीवन जीने वाले और अनुशासन प्रिय थे।
सिंधु सभ्यता का मुख्य व्यवसाय पशु पालन एवं कृषि माना जाता है। वे पशुओं के साथ सहज जीवन जीते थे। खुदाई से मिट्टी की एक बैलगाड़ी मिली है। बैलगाड़ी किसी भी समाज की सांस्कृतिक धरोहर हो सकती है जिसमें भव्यता और आडंबर कहीं भी दिखाई देता। सिंधु सभ्यता में घरों के खंडहरों को देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है। ये आकार में छोटे और साधारण परिवेश से मेल खाते हैं। दो मंजिला इमारतों की भी कल्पना की गई है। परंतु बहुमंजिला महल और भव्य इमारतें भी होंगी ऐसा अनुमान नहीं लगाया जा सकता। बर्तनों और मृद भांडों को देखकर भी यही कहा जा सकता है कि सिंधु सभ्यता में खान-पान में साधारण बर्तनों का प्रयोग किया जाता था। सिंधु सभ्यता में औजारों का प्रयोग तो बहुत मिलता है परंतु हथियार भी प्रयोग में होते होंगे इसका कोई प्रमाण नहीं हैं। वे लोग अनुशासन प्रिय थे परंतु यह अनुशासन किसी ताकत के बल के द्वारा कायम नहीं किया गया बल्कि लोग अपने मन और कर्म से ही अनुशासन प्रिय थे। बड़े मंदिरों और देवी-देवताओं की बड़ी मूर्तियों के अवशेष भी नदारद हैं। अगर सिंधु सभ्यता से जुड़े लोग धर्मपरायण होते तो इस खुदाई में किसी बड़े मंदिर और मूर्तियों के अवशेष अवश्य मिलते। मोहनजोदड़ो की खुदाई में एक दाढ़ी वाले नरेश की छोटी मूर्ति मिली है परंतु यह मूर्ति किसी राजतंत्र या धर्मतंत्र की प्रमाण नहीं कही जा सकती। विश्व की अन्य सभ्यताओं के साथ तुलनात्मक अध्ययन से भी यही अनुमान लगाया जा सकता है कि सिंधु सभ्यता की खूबी उसका सौंदर्य बोध है जो कि समाज पोषित है राज पोषित अथवा धर्म पोषित नहीं है।

प्रश्न 3. मोहनजोदड़ो के अजायबघर में खुदाई के समय मिली कौन-कौन सी चीजें रखी हैं?
अथवा
मोहनजोदड़ो के अजायबघर का वर्णन करें ।

उत्तर – लेखक ओम थानवी जब मोहनजोदड़ो की यात्रा पर गए तो उनके गाइड ने एक छोटा अजायबघर भी दिखाया था। लेखक के अनुसार-“यह अजायबघर छोटा है जैसे किसी कस्बाई स्कूल की इमारत हो सामान भी ज्यादा नहीं है।” इस अजायबघर में रखी चीजों की संख्या पचास हजार से अधिक रही होगी। मोहनजोदड़ो की खुदाई से मिली महत्त्वपूर्ण चीजें अब कराची, दिल्ली और लंदन के अजायबघरों में रखी हुई हैं। इस अजायबघर में जो चीजें रखी गई हैं वे सिंधु सभ्यता के साक्षात दर्शन करवा देती हैं। काला पड़ गया गेहूँ, ताँबे और काँसे के बर्तन, मुहरें, वाद्य, चाक पर बने विशाल मृद-भांड, उन पर काले भूरे चित्र, दो ताँबे के आइने, कैंघी, मिट्टी के बर्तन, दो पाटन की चक्की, मिट्टी की बैलगाड़ी और दूसरे खिलौने। रंग-बिरंगे पत्थरों के मनकों वाले हार, चौपड़ की गोटियाँ, कैंगन और सोने के कैंगन। सोने के कँगन अब शायद चोरी हो गए हैं। इस प्रकार सभ्य समाज का जो साजो-समान होता है वह सब सिंधु घाटी की सभ्यता में देखने को मिलता है। इस प्रकार सिंधु सभ्यता दुनिया की प्राचीनतम सभ्यताओं में सबसे अनूठी एवं संस्कृति प्रधान सभ्यता है।

प्रश्न 3. मोहनजोदड़ो के अवशेष कितने पुराने हैं ? इन्होंने भारत को प्राचीन सभ्यताओं की किस श्रेणी में ला खड़ा किया है ?
अथवा
“अतीत में दबे पाँव” पाठ के आधार पर बौद्ध स्तूप का वर्णन कीजिए।

उत्तर – मोहनजोदड़ो के अवशेष ईसा पूर्व के हैं। इसके सबसे बड़े और ऊँचे चबूतरे पर बने बौद्ध स्तूप में छब्बीस सदी पहले की ईंटें लगी हुई हैं जिसमें भिक्षुओं के भी कमरे हैं। इस खोज ने भारत को मिस्र और मेसोपोटामिया (इराक) को प्राचीन सभ्यताओं के समकक्ष खड़ा कर दिया है।

प्रश्न 4. सिंध क्षेत्र में सर्दियों में वातावरण कैसा होता है?

उत्तर – सिंधु घाटी की सभ्यता का क्षेत्र सिंध राजस्थान से कुछ मिलता-जुलता है। सर्दियों में भी दोपहर के समय धूप चौधियानी वाली होती है। वह राजस्थान की धूप की तरह पारदर्शी नहीं है जिस कारण सारा वातावरण और दिशाएँ फीके से रंग में रंगी हुई प्रतीत होती हैं। रेत के टीले नहीं हैं और खेतों में हरियाली है। खुला आसमान, सूना परिवेश, धूल, बबूल और अधिक गर्मी और सर्दी यहाँ के वातावरण की विशिष्टताएँ हैं।

प्रश्न 5. मोहनजोदड़ो में जल निकासी की व्यवस्था किस प्रकार की गई थी ?

उत्तर – मोहनजोदड़ो में सभी नालियाँ ढकी हुई थीं जो सड़क के दोनों तरफ समांतर बनी हुई थीं। हर घर में एक स्नानघर था। घरों के भीतर से गंदा पानी नालियों से बाहर हौदी तक आता था और फिर नालियों के जाल में मिल जाता था। कहीं-कहीं नालियाँ बिना ढकी हुई थीं।

प्रश्न 6. मोहनजोदड़ो को ‘जल संस्कृति का नाम क्यों दिया जाता है ?

उत्तर – मोहनजोदड़ो में जल का प्रबंधन बहुत अच्छे और सुविचारित ढंग से किया गया था इतिहासकारों के अनुसार सिंधु घाटी सभ्यता पहली ऐसी ज्ञात संस्कृति है जिन्होंने कुएँ खोद कर भू-जल तक पहुँचने की क्षमता प्राप्त की थी। केवल मोहनजोदड़ो में ही लगभग सात सौ कुएँ थे। नदी, कुएँ, कुंड, स्नानागार और बेजोड़ जल-निकासी के कारण ही मोहनजोदड़ो को जल संस्कृति का नाम दिया जाता है।

पाठ 4 डायरी के पन्ने महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. ऐन को किस कारण लगा था कि उसकी दुनिया पूरी तरह से उलट-पुलट गई थी ?

उत्तर – ऐन के घर बुधवार, 8 जुलाई, सन् 1942 ई० को संदेश आया था कि उसकी सोलह वर्षीय बहन मार्गोट को ए० एस० एस० से बुलावा आया था। इस बुलावे का अर्थ यातना शिविर से बुलाया जाना था जिसमें उसे जर्मन सैनिकों की दया पर छोड़ देना था। ऐन के माता-पिता को यह बिल्कुल भी स्वीकार नहीं था इसलिए उन्होंने तुरंत भूमिगत हो जाने का निश्चय कर लिया था जिससे ऐन को लगा था उसकी दुनिया पूरी तरह से उलट-पुलट हो गई थी।

प्रश्न 2. ऐन ने अपने थैले में क्या-क्या भरा था ? क्यों ?

उत्तर – ऐन ने अपने थैले में डायरी, कर्लर, रुमाल, स्कूली किताबें, कंघी और पुरानी चिट्ठियाँ भरी थीं। वह कपड़ों की तुलना में स्मृतियों को अधिक महत्त्व देना चाहती है।

प्रश्न 3. ऐन की अज्ञातवास के समय रुचियाँ क्या थी ?

उत्तर – ऐन को पत्रिकाओं से इकट्ठा करती थी; उनकी समीक्षा करती थी प्रति सप्ताह प्रकाशित होने वाली सिनेमा एंड थियेटर पत्रिका ध्यान से पढ़ती फ़िल्मी कलाकारों के चित्र इकट्ठे करने की रुचि थी। वह फ़िल्मों के बारे में ज्ञान थी। वह फ़िल्मी अभिनेत्रियों की तरह अपने बाल संवारा करती थी और उन्हें अपना स्टाइल बनाया करती थी। कुछ
देर बाद फिर से वह अपने घुँघराले बालों वाले स्टाइल में ही आ जाया करती थी।

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