भक्तिन Class 12 Hindi Summary Chapter 1 – आरोह भाग 2

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Bhaktin Class 12 Hindi Chapter 1 Summary


पाठ 1 भक्तिन पाठ का सार

प्रस्तुत पाठ ‘भक्तिन’ कक्षा 12 की पुस्तक आरोह भाग 2 से लिया गया है। इस पाठ की लेखिका महादेवी वर्मा है। इस पाठ में भक्तिन का वर्णन किया गया है जो अपना जीवन कष्टता से व्यतीत करती है और फिर काम की तलाश में लेखिका के पास सेवक के रूप में आ जाती है। पाठ का सार इस प्रकार हैं-

सेवक धर्म में हनुमान जी से पर्दा करने वाली दुबले पतले शरीर की भक्तिन का वास्तविक नाम लक्ष्मी है। लेकिन उसका जीवन उसके नाम के बिल्कुल विपरीत था। भक्तिन का जन्म झूंसी गांव में हुआ था। छोटे कद की भक्ति के पतले होंठ और दुबला शरीर था। 5 वर्ष की आयु में उसका विवाह हो गया और 9 वर्ष की आयु में उसका गौना हो गया। उसकी तीन बेटियां पैदा हुई । तीन पुत्रियां पैदा करने के कारण ससुराल में उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं किया जाता था क्योंकि उसकी सास ने तीन पुत्रों को जन्म दिया था। इसीलिए ससुराल में उसके साथ बुरा व्यवहार किया जाता था। अपनी पहली बेटी का विवाह करने के पश्चात भक्तिन का पति अपनी 29 वर्षीय पत्नी और दो बेटियों को संसार में अकेला छोड़कर चला गया। उसके बाद उसके जेठ जेठानीयों ने उससे उसकी जमीन हथियाने की कोशिश की लेकिन भक्ति ने किसी तरह अपनी जमीन बचा ली। उसने अपनी बाकी दोनों बेटियों का विवाह भी कर दिया और उनके पति को घर जमाई बना लिया। लेकिन भाग्य ने भी भक्तिन का साथ नहीं दिया। उसकी पहली बेटी विधवा हो गई। भक्तिन की संपत्ति हड़पने के लिए बड़े जेठ ने अपने तीतर लड़ाने वाले साले को बुला लिया और अपनी चालबाजी से भक्तिन की विधवा बेटी का विवाह उससे करवा दिया। अब भक्तिन के हाथ से उसके खेत खलियान और जानवर सब कुछ जा चुके थे और काम की तलाश में भक्तिन ने शहर की तरफ रुख किया।

शहर आकर भक्तिन महादेवी वर्मा के घर पर सेवक धर्म में दीक्षित हुई। महादेवी वर्मा ने ही लक्ष्मी का नाम भक्तिन उसके गले में पड़ी कंठी माला देख कर रखा था। भक्तिन की वेशभूषा में गृहस्थ और वैरागी का सम्मिश्रण था। उसके साथ रहते रहते लेखिका भी देहाती हो चुकी थी पर पतले को शहरी नहीं बना सकी। लेखिका द्वारा पुकारी जाने पर भक्तिन आँय कहती थी। भक्तिन का स्वभाव ऐसा बन चुका था कि वह दूसरों को अपने मन के अनुसार बना लेना चाहती थी पर स्वयं परिवर्तित नहीं होती थी। भक्तिन ने लेखिका का अच्छे से ख्याल रखा। भक्तिन अच्छी है, यह कहना कठिन होगा, क्योंकि उसमें दुर्गुणों का अभाव नहीं। भक्तिन कभी भी सत्यवादी हरिश्चंद्र नहीं बन सके। लेखिका के इधर उधर पड़े पैसे भंडार घर की किसी मटकी में कैसे चले जाते थे यह रहस्य भक्तिन ही जानती है। शास्त्र का प्रश्न भी भक्तिन अपनी सुविधा के अनुसार सुलझा लेती है। भक्तिन सुबह लेखिका के उठने से पहले उठ जाया करती थी और लेखिका के सोने के बाद सोती थी।

लेखिका को भक्तिन का और भक्तिन को लेखिका का साथ अब अच्छा लगने लगा था लेखिका जहां भी जाती वह अपने साथ भक्तिन को पाती चाहे वह पहाड़ों की बात हो या फिर गांव की धूल भरी पगडंडियों की। एक बार जब भक्तिन के बेटी-दमाद उसके नाती को लेकर भक्तिन को लेने आए तब उसने उनके साथ जाने से मना कर दिया। भक्तिन उनको रुपए भेज देती थी पर वह लेखिका को छोड़कर नहीं जाना चाहती थी। जब गत वर्ष युद्ध ने वीरता के स्थान में पलाइन वृत्ति जगा दी थी तब भक्तिन लेखिका को गांव चलने का अनुरोध करती है। यद्यपि लेखिका के पास रुपए नहीं थे फिर भी वह उसको अपने खर्चे पर अपने गांव ले जाती हैं। उसके बाद वे वापस शहर आ जाते हैं। उनके बीच सेवक स्वामी का ऐसा संबंध हो गया था कि लेखिका चाह कर भी उसे नहीं निकाल सकती थी और यदि लेखिका भक्तिन को काम से निकालना भी चाहे तो भक्तिन उनकी बात को हंसकर टाल देती थी। भक्तिन कारागार से वैसे ही डरती थी जैसे यमलोक से। लेखिका अक्सर सोचा करती थी कि यदि कभी ऐसा बुलावा आ पहुंचा जहां मैं भक्तिन को ना ले जा सकी तो भक्तिन क्या करेगी और मैं क्या करूंगी?
यह कहानी अभी अधूरी है और लेखिका इसको पूरा नहीं करना चाहती।

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