HBSE Class 11 नैतिक शिक्षा Chapter 19 बुद्धि स्थिर एवं अच्छी रहे Explain Solution

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बुद्धि स्थिर एवं अच्छी रहे Class 11 Naitik Siksha Chapter 19 Explain


व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । 
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ।। 2/41

व्यवसायात्मिका, बुद्धिः एका, इह, कुरुनन्दन । 
बहुशाखाः, हि, अनन्ताः, च, बुद्धयः, अव्यवसायिनाम् ।।

समबुद्धि होती है अर्जुन! वही,
निश्चय हो जिस बुद्धि का एक ही ।
न होता स्थिर निश्चय जिस बुद्धि का,
सकामी पुरुष वो रहे भटकता ।।

भावार्थ —

बुद्धि बिगड़े नहीं, अच्छी रहे यह बहुत आवश्यक है। साथ ही यह भी कि बुद्धि का निश्चय स्थिर हो। निश्चय बदलते रहने की आदत किसी भी क्षेत्र में अच्छे परिणाम नहीं देती। सार यह है कि बौद्धिक अस्थिरता अर्थात् निर्णय में हलचल की स्थिति न हो।

श्रीमद्भगवद्गीता में बुद्धि को बहुत आदर दिया गया है। आवश्यक भी है। किसी भी गाड़ी में ड्राइवर अथवा रथ में सारथि की भूमिका का सम्मान तो है ही। बुद्धि जीवन रूपी रथ का सारथि है। बुद्धि अच्छी है तो जीवन अच्छे मार्ग की ओर चलेगा। बुद्धि बिगड़ी तो सब कुछ बिगड़ा । बुद्धिः नाशात् प्रणश्यति (गीता 2/63)

भह भी ध्यान रहे कि बुद्धि कोई ठोस अंग नहीं, निर्णयात्मिका शक्ति है। बुद्धि का कार्य निर्णय करना है। यह बात स्पष्ट है ही कि जैसा बुद्धि का निर्णय होता है, जीवन की गाड़ी उधर ही चल देती है। निर्णय के पीछे संगति का भी प्रभाव रहता है। अच्छी संगति तो बुद्धि अच्छाई के निर्णय पर रहेगी। अच्छी पढ़ाई करने वाले बच्चों की संगति ‘अच्छी पढ़ाई अच्छे जीवन की ओर बुद्धि को प्रेरित करेगी। इसके विपरीत यदि संगति ऐसे बच्चों की हो गई, जिनका ध्यान पढ़ाई में कम एवं बुरी आदतों में अधिक है तो बुद्धि पर ऐसा बुरा प्रभाव पड़ता है जिससे सारे जीवन का खेल बिगड़ जाता है। बच्चो ! यह भी ध्यान रखों कि सीढ़ी के द्वारा छत पर चढ़ने में कितनी मेहनत लगती है, लेकिन गिरने में एक क्षण। चढ़ने और गिरने के पीछे बुद्धि के निर्णय की बहुत बड़ी भूमिका है तथा बुद्धि के निर्णय में संगति की। अच्छी संगति मिली. अच्छा निर्णय हुआ, अच्छे जीवन की ओर आगे बढ़ने का क्रम प्रारम्भ होगा लेकिन दुर्भाग्य से बुरी संगति मिल गई, बुद्धि बिगड़ गई, तब गिरने में जरा भी देर नहीं लगेगी।

बुद्धि अच्छी और स्थिर रहे- वस्तुतः यह जीवन की प्रथम आवश्यकता है। बुद्धि नाम निर्णय करने का है। अच्छे और स्थिर निर्णय पर ही जीवन की स्थिरता निर्भर करती है।

अस्थिर निश्चय वाले प्रायः भ्रमित, अस्थिर और विचलित रहते हैं। आजकल वैसे तो प्रत्येक क्षेत्र में ही यह समस्या रहती है, लेकिन बचपन यौवन में यह दुविधा कहीं अधिक देखी जा रही है। यह करें या वह इसी भ्रमजाल में बुद्धि अटकी रहती है। या फिर ऐसा भी होता किसी की देखादेखी अथवा किसी के जरा सा कहने पर या फिर वैसे ही उस निर्णय को बदल दिया । बदला नहीं भी तो यही सोचते रहे कि ऐसा कर लेते तो शायद अधिक अच्छा होता।

बहुत से बच्चों को देखा जाता है-किसी एक निर्णय पर स्थिर न रह पाने के कारण आगे नहीं बढ़ पाते। दुविधा या भ्रम की स्थिति न तो बौद्धिक विकास होने देती है, न मानसिक स्थिरता बनने देती है और न ही किसी एक विषय या क्षेत्र में पूर्णता प्राप्त है। एक जगह कुछ खुदाई की…..फिर वहाँ से छोड़कर दूसरी तीसरी चौथी जगह सोचो, पानी कहीं से भी मिलेगा क्या ? है-एक निर्णय किया,

बुद्धि जागरूक रहे, पहले से ही सही गलत का विवेक कर ले, तत्पश्चात् किये गये निर्णय में स्थिरता, परिणाम स्वतः दिखाई देंगे। अस्थिर, भ्रमित, दुविधाग्रस्त स्थिति बिल्कुल नहीं। बच्चो ! आओ, गीताजी के इस श्लोक को अपने जीवन में लाकर देखें ! बुद्धि निर्णयों के जंजाल में उलझकर न रह जाये। बहुत बड़ी क्षमता बुद्धि के रूप में हमारे पास है, उसका सदुपयोग करें। निर्णय विचारपूर्वक करें, अच्छा करें, पक्का करें ।

यह दृढ़ विश्वास रखो कि आप में बहुत बड़ी क्षमतायें है, जीवन के किसी भी क्षेत्र में आप आगे बढ़ सकते हैं। जो जो भी जिस जिस क्षेत्र में ऊँचाईयों तक पहुँचे उन्हें अपने जीवन का आदर्श बनाओ और विचार करो कि वे कैसे इस सफलता को प्राप्त कर पाये ? आप पाओगे कि उनके जीवन में निर्णय दृढ़ रहा होगा, बुद्धि भ्रमित और अस्थिर नहीं होगी ।


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