HBSE Class 11 नैतिक शिक्षा Chapter 2 यम नियम Explain Solution

Class 11 Hindi Naitik Siksha BSEH Solution for Chapter 2 यम नियम Explain for Haryana board. CCL Chapter Provide Class 1th to 12th all Subjects Solution With Notes, Question Answer, Summary and Important Questions. Class 11 Hindi mcq, summary, Important Question Answer, Textual Question Answer, Word meaning, Vyakhya are available of नैतिक शिक्षा Book for HBSE.

Also Read – HBSE Class 11 नैतिक शिक्षा Solution

Also Read – HBSE Class 11 नैतिक शिक्षा Solution in Videos

HBSE Class 11 Hindi Naitik Siksha Chapter 2 यम नियम / Yam Niyam Explain for Haryana Board of नैतिक शिक्षा Class 11th Book Solution.

यम नियम Class 11 Naitik Siksha Chapter 2 Explain


प्रण करता हूँ, प्रण पालन की शक्ति प्रभु मुझ को दे दो ।
यम-नियम पालन करने की शक्ति प्रभु मुझ को दे दो ।।

महर्षि पतंजलि ने जीवन को सार्थक बनाने के लिए योग अनिवार्य बताया है। योग एक विशिष्ट जीवन-पद्धति है, जिससे मनुष्य स्वस्थ, शान्त, सुखी, प्रसन्न एवं नीरोग रह सकता है। श्रीकृष्ण जी अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं- “समत्वं योग उच्यते” । हे अर्जुन! योग-युक्त होकर मोह छोड़कर ज्ञानपूर्वक कर्म करो और सफलता एवं असफलता में समभाव रखो। जिस प्रकार योगासन करने से शारीरिक स्वास्थ्य लाभ होता है, उसी प्रकार यम-नियम आदि का पालन करने से मानसिक एवं बौद्धिक लाभ प्राप्त होता है।

योग के आठ अंग है –

  1. यम
  2. नियम
  3. आसन
  4. प्राणायाम
  5. प्रत्याहार
  6. धारणा
  7. ध्यान
  8. समाधि

इसी कारण से इसे अष्टांग योग कहा जाता है। इन आठ अंगों में प्रथम दो अंग यम और नियम जीवन के पालन का मार्ग है। यह एक पद्धति है, जिससे जीवन का मार्ग अपने आप स्पष्ट दिखाई देता है योगदर्शन में यमः नामक अंग को निम्नलिखित सूत्र से स्पष्ट किया गया है –

“अहिंसा सत्यास्तेय ब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः यम पाँच होते हैं – अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह।

अहिंसा – हिंसा न करना। “अहिंसा परमो धर्म का सिद्धान्त जैन बौद्ध आदि सभी धर्मों में समानरूप से माना जाता है। मन, वचन और कर्म से किसी जीव के प्रति हिंसा का भाव न रखना अहिंसा है। हमारे द्वारा अहिंसा भाव अपनाने से सभी जीव-जन्तु हमारे प्रति वैर भावना को त्याग देते हैं- योग शास्त्र में निम्नलिखित सूत्र में इसी बात की पुष्टि की गई है- “अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधी वैरत्याग:”

सत्य – प्रत्यक्ष में देखा, सुना, पढ़ा व अनुमान किया गया कि जो ज्ञान मन में है, उसे वैसा ही वाणी से प्रकट करना और उसी को शरीर से आचरण में लाना सत्य कहलाता है। योगदर्शन में कहा है- सत्यप्रतिष्ठाया सर्वक्रियाफलाश्रयत्वम्’ अर्थात् सभी क्रियाओं का फल सत्य पर आश्रित होता है। सत्य बोलने वाले व्यक्ति में कभी आत्मविश्वास की कमी नहीं हो सकती। आत्मविश्वास परिपूर्ण व्यक्ति जीवन में कभी असफल नहीं हो सकता। कहा जाता है कि “सर्व सत्ये प्रतिष्ठितम् ।

अस्तेय – चोरी न करना। मन वचन और कर्म से किसी अन्य की वस्तु का उपभोग न करना। योगसूत्र के अनुसार “अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्’ अर्थात् चोरी न करने वाले व्यक्ति को सभी मूल्यवान वस्तुएँ उपलब्ध हो जाती है। ब्रह्मचर्य मन तथा इन्द्रियों पर संयम करके शारीरिक शक्तियों की रक्षा करना, वेदादि सत्य शास्त्रों को पढ़ना तथा ईश्वर की उपासना करना ही ब्रह्मचर्य है। पतंजलि ऋषि ने योगदर्शन में लिखा है- “ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः” अर्थात् मन, वचन और कर्म से ब्रह्मचर्य का पालन करने से सभी प्रकार का वीर्यलाभ अर्थात् बल प्राप्त होता है।

अपरिग्रह – तृष्णा का त्याग हानिकारक एवं अनावश्यक वस्तुओं का संग्रह न करना।

घर सम्पत्ति भूमि धन आदि जरूरत के अनुसार रहें ।।

जितना अधिक हो दान करूँ में शक्ति भगवान मुझे दे दो।।

इन पाँचों यमों का पालन मनुष्य के जीवन को सहज सरल और उत्तम बनाता है।

योग का दूसरा अंग है नियम –

योगदर्शन में नियम अंग के विषय में निम्नलिखित सूत्र का उल्लेख है

“शाचसन्तोषतपः स्वाध्याय ईश्वरप्रणिधानानि” इति नियमाः ।

नियम पाँच होते हैं- शीच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्रणिधान ||

शौच – शुद्धि। शुद्धि दो प्रकार की होती है- बाह्यशुद्धि और आन्तरिकशुद्धि। शरीर, वस्त्र, पात्र, स्थान, खान-पान आदि को शुद्ध रखना बाह्य शुद्धि कहलाती है। विद्या, सत्संग, स्वाध्याय, सत्यभाषण आदि का मन, वचन और कर्म से पालन करना आन्तरिक शुद्धि है।

सन्तोष – मन, वचन और कर्म से पूर्ण पुरुषार्थ करने के पश्चात् जितना भी आनन्द, विद्या, बल, धन आदि फलरूप में प्राप्त हो, उतने से ही सन्तुष्ट रहना सन्तोष कहलाता है। योगदर्शन में कहा है- सन्तोषादनुत्तमः सुख लाभः” अर्थात् सन्तोष से अनुपम सुख की प्राप्ति होती है।

तप – “द्वन्द्वसहनं तपः” अर्थात् द्वन्द्वों को सहन करना ही तप कहलाता है। धर्माचरणरूप उत्तम करने योग्य कर्मों को करते हुए भूख-प्यास सर्दी-गर्मी, हानि-लाभ, मान-अपमान तथा भय-दुःख आदि द्वन्द्वों को धैर्य पूर्वक सहन करना ही तप है। इस प्रकार का आचरण करने वाले व्यक्ति ही वास्तव में तपस्वी कहलाने योग्य हैं।

स्वाध्याय – स्व-अध्ययन । वेद उपनिषद् तथा सत् शास्त्रों को पढ़ना तथा उनके द्वारा प्रतिपादित विषय का चिन्तन करना स्वाध्याय कहलाता है। मोक्ष प्राप्ति कराने वाले शास्त्रों को पढ़कर परमात्मा के मुख्य नाम “ओ३म्” तथा आत्मा, परमात्मा, ब्रह्म आदि गूढ़ विषयों का चिन्तन करना ही स्वाध्याय कहलाता है।

ईश्वर प्रणिधान – शरीर, बुद्धि, बल, धन आदि समस्त साधनों को ईश्वर प्रदत्त मानकर उनका प्रयोग मन, वाणी तथा शरीर से ईश्वर की प्राप्ति के लिए ही करना प्रणिधान कहलाता है। इसका सीधा अर्थ है कि ईश्वर का ध्यान करना, ईश्वर में मन लगाकर उसके गुणों और कृपा का चिन्तन करना ।

जिस साधना के द्वारा आत्मा का परमात्मा से मिलन हो सकता है, उसे योग कहा जाता है। जीव की सबसे बड़ी सफलता ईश्वर की प्राप्ति कर लेना है। जीव छोटे से बड़ा बनने के लिए, अपूर्ण से पूर्ण होने के लिए, बन्धन से मुक्त होने के लिए अनन्तकाल से प्रयत्न करता आ रहा है। यह प्रयत्न योग द्वारा सफल हो सकता है। मानवमात्र के लिए कल्याणकारी योग को आज योगाचार्यों ने सभी देशों में योग की राह दिखाकर मनुष्यों को मन, वचन और कर्म से स्वस्थ रहने के लिए अनुपम वरदान दिया तथा भारत सरकार के प्रयास से वर्ष 2015 में अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर समस्त विश्व ने एकमत होकर 21 जून को “योग दिवस’ के रूप में मनाने का संकल्प लिया।


 

Leave a Comment

error: cclchapter.com