Class 10 Hindi Important Questions 2021 – क्षितिज भाग 2

HBSE Class 10 Hindi Important Questions and Answers for 2021 Exams. Here i added all the Important Questions of Kshitij-2 from Class 10 Hindi. As you Know Haryana Board as well as other boards like CBSE Changed their Syllabus for 2021 Exams due to study is not performed well. Now HBSE changed class 10 Hindi Syllabus also . So Here i added all Important Questions after changing in Syllabus. Some Chapters has deleted so your important questions from क्षितिज भाग 2 is changed also. HBSE Paper Pattern is not changed more but Chapters reduced. here i Provided all the Important Questions of Class 10 Hindi 2020-21 with Chapter wise.

Class 10 Hindi Important Questions 2021

पाठ 1 नेताजी का चश्मा महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. सेनानी न होते हुए भी चश्मे वाले को लोग कैप्टन क्यों कहते थे ? ( VVI )
अथवा
कैप्टन के चरित्र की विशेषताएँ।

उत्तर – चश्मे वाला कोई सेनानी नहीं था और न ही वे देश की फ़ौज में था। फिर भी लोग उसे कैप्टन कहकर बुलाते थे। इसका कारण यह रहा होगा कि चश्मे वाले में देशभक्ति की भावना कूट-कूट कर भरी हुई थी। वह अपनी शक्ति के अनुसार देश के निर्माण में अपना पूरा योगदान देता था कैप्टन के कस्बे में चौराहे पर नेता जी सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति लगी हुई थी। मूर्तिकार उस मूर्ति का चश्मा बनाना भूल गया। कैप्टन ने जब यह देखा तो उसे बड़ा दुःख हुआ। उसके मन में देश के नेताओं के प्रति सम्मान और आदर था। इसीलिए वह जब तक जीवित रहा उसने नेता जी की मूर्ति पर चश्मा लगाकर रखा था। उसकी इसी भावना के कारण लोग उसे कैप्टन कहकर बुलाते थे।

प्रश्न 2. पान वाले का एक रेखाचित्र प्रस्तुत कीजिए। ( VVI )
अथवा
पान वाले के चरित्र की किन्हीं दो विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

उत्तर – पान वाले की दुकान चौराहे पर नेता जी की मूर्ति के सामने थी। पान वाले का रंग काला था। वह शरीर से मोटा था। उसकी आँखें हैंसती हुई थीं। उसकी तोंद निकली हुई थी। जब यह किसी बात पर हँसता तो उसकी तोंद गेंद की तरह ऊपर-नीचे उछलती थी। वह स्वभाव से खुश मिजाज था। बार-बार पान खाने से उसके दाँत लाल-काले हो गए थे। वह कोई भी बात करने से पहले मुँह में रखे पान की नीचे की ओर धूकता था यह उसकी आदत भी बन चुकी थी। पान वाले के पास हर किसी की पूरी जानकारी रहती थी जिसे वह बढ़े रसीले अंदाज़ से दूसरे के सामने प्रस्तुत करता था। वह मन का अच्छा था और इसीलिए कैप्टन की मृत्यु की खबर सुनाते समय उसकी आँखों में उदासी के भाव प्रकट हो गए थे।

प्रश्न 3. ‘नेता जी का चश्मा’ पाठ का उद्देश्य स्पष्ट कीजिए।
अथवा
नेता जी का चश्मा’ पाठ का मूल भाव स्पष्ट कीजिए। ( VVI )

उत्तर – ‘नेता जी का चश्मा’ पाठ के लेखक स्वयंप्रकाश हैं। इस पाठ का उद्देश्य देश-प्रेम का वर्णन करना है। देश का निर्माण कोई अकेला नहीं कर सकता है। जब-जब देश का निर्माण होता है उसमें कुछ नाम प्रसिद्ध हो जाते हैं और कुछ नाम गुमनामी के अंधेरे में खो जाते हैं। प्रस्तुत पाठ में भी यही दर्शाया गया है कि नगरपालिका वाले कस्बे के चौराहे पर नेता जी सुभाष चंद्र बोस की मूर्ति लगवाते हैं। मूर्तिकार नेता जी की मूर्ति का चश्मा बनाना भूल जाता है। उस कस्बे में कैप्टन नाम का व्यक्ति चश्मे बेचने वाला है। उसे बिना चश्मे के नेता जी का व्यक्तित्व अधूरा लगता है। इसलिए वह उस मूर्ति पर अपने पास से चश्मा लगवा देता है। सब लोग उसका मज़ाक उड़ाते हैं। उसके मरने के बाद नेता जी की मूर्ति बिना चश्मे के चौराहे पर लगी रहती है। बिना चश्मे की मूर्ति हालदार साहब को भी दुःखी कर देती है। वह ड्राइवर से चौराहे पर बिना रुके आगे बढ़ने को कहते हैं लेकिन उनकी नजर अचानक मूर्ति पर पड़ती है जिस पर किसी बच्चे द्वारा सरकंडे का बनाया चश्मा लगा हुआ था। यह दृश्य हालदार साहब को देशभक्ति की भावना से भर देता है। अत: इस पाठ का प्रमुख लक्ष्य है कि देश के निर्माण में करोड़ों गुमनाम व्यक्ति अपने-अपने ढंग से योगदान देते हैं। इस योगदान में बड़े ही नहीं अपितु बच्चे भी शामिल होते हैं

पाठ 2 बालगोबिन भगत महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. खेती-बारी से जुड़े गृहस्थ बालगोबिन भगत अपनी किन चारित्रिक विशेषताओं के कारण साधु कहलाते थे? ( VVI )

उत्तर – खेती-बारी से जुड़े गृहस्थ बालगोबिन भगत वेशभूषा से साधु नहीं लगते थे परंतु उनका व्यवहार साधु जैसा था। वे कबीर के भगत थे। कबीर के ही गीत गाते थे । उनके बताए मार्ग पर चलते थे। वे कभी भी झूठ नहीं बोलते थे। वे कभी भी किसी से निरर्थक बातों के लिए नहीं लड़ते थे परंतु ग़लत बातों का विरोध करने में संकोच नहीं करते थे। वे कभी भी किसी की चीज को नहीं छूते थे और न ही व्यवहार में लाते थे। उनकी सब चीज़ साहब (कबीर) की थी। उनके खेत में जो पैदावार होती थी उसे लेकर कबीर के मठ पर जाते थे। वहाँ से उन्हें जो प्रसाद के रूप में मिलता था उसी में अपने परिवार का निर्वाह करते थे। बालगोबिन भगत की इन्हीं चारित्रिक विशेषताओं के कारण लेखक उन्हें साधु मानता था।

प्रश्न 2. भगत ने अपने बेटे की मृत्यु पर अपनी भावनाएँ किस तरह व्यक्त कीं ?

उत्तर – भगत का एक बेटा था। वह बीमार रहता था। एक दिन वह मर गया। भगत ने अपने बेटे के मरने पर शोक नहीं मनाया। उसके अनुसार उसके बेटे की आत्मा परमात्मा के पास चली गई है। आज एक विरहिनी अपने प्रेमी से मिलने गई है और उसके मिलन की खुशी में आनंद मनाना चाहिए न कि अफ़सोस। उन्होंने अपने बेटे के मृत शरीर को फूलों से सजाया था। पास में एक दीपक जला रखा था वे अपने बेटे के मृत शरीर के पास आसन पर बैठे मिलन के गीत गा रहे थे। उन्होंने अपने बेटे की बहू को भी रोने के लिए मना कर दिया था। उसे भी आत्मा के परमात्मा में मिलने की खुशी में आनंद मनाने को कहा।

प्रश्न 3. ‘बालगोबिन भगत’ पाठ के माध्यम से लेखक क्या संदेश देना चाहता है ?
अथवा
‘बालगोबिन भगत’ पाठ का मूलभाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – ‘बालगोबिन भगत’ पाठ के लेखक ‘रामवृक्ष बेनीपुरी’ हैं। लेखक बचपन से ही बालगोबिन भगत को आदरणीय व्यक्ति मानता आया है। लेखक ब्राह्मण था और बालगोबिन भगत एक तेली थे तेली को उस समय के समाज में अच्छा नहीं समझा जाता था। फिर भी ‘बालगोबिन भगत’ सबकी आस्था के कारण थे।
लेखक ने इस पाठ के माध्यम से वास्तविक साधुत्व का परिचय दिया है। गृहस्थी में रहते हुए भी व्यक्ति साधु हो सकता है। साधु की पहचान उसका पहनावा नहीं अपितु उसका व्यवहार है। व्यक्ति का अपने नियमों पर दृढ़ रहना, निजी आवश्यकताओं को सीमित करना, सामाजिक कुरीतियों को दूर करने के लिए प्रयत्नशील होना तथा मोह-माया के जाल से दूर रहने वाला व्यक्ति ही साधु हो सकता है। बालगोबिन भगत भगवान् के निराकार रूप को मानते थे उनके अनुसार उनका जो भी है वह मालिक की देन है उस पर उसी का अधिकार है। इसीलिए वे अपने खेतों की पैदावार कबीर मठ में पहुँचा देते थे। बाद में प्रसाद के रूप में जो मिलता उसी से अपना निर्वाह करते थे। उन्होंने अपने पुत्र की मृत्यु पर अपनी फुक्वधू से सभी क्रिया कर्म करवाए। वे समाज में प्रचलित मान्यताओं को नहीं मानते थे। उन्होंने पुत्रवधू को पुनर्विवाह के लिए उसके घर भेज दिया था। वे अपने निजी स्वार्थ के लिए कुछ नहीं करते थे। उनके सभी कार्य परहित में होते थे वे अंत तक अपने बनाए नियमों में विश्वास करते हुए जीते रहे थे उन्होंने आत्मा के वास्तविक रूप को पहचान लिया था। अंत में आत्मा का परमात्मा से मिलन हो जाता है इसीलिए उसका मुंह व्यर्थ है। व्यक्ति को अपनी मुक्ति के लिए परमात्मा से प्रेम करना चाहिए
इस पाठ के माध्यम से लेखक लोगों को पाखंडी साधुओं से सचेत करना चाहता है। वास्तविक साधु वही होते हैं जो समाज के सामने उदाहरण प्रस्तुत करें और समाज को पुरानी सड़ी गली परंपराओं से मुक्त कराएं।

पाठ 3 लखनवी अंदाज महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. लेखक को नवाब साहब के किन हाव-भावों से महसूस हुआ कि वे उनसे बातचीत करने के लिए तनिक भी उत्सुक नहीं है ? ( VVI )

उत्तर – लेखक ने डिब्बे में प्रवेश किया तो वहां पहले से ही एक सज्जन पुरुष पालथी लगाए सीट पर बैठे थे। उनके सामने खीरे रखे थे। लेखक को देखते ही उनके चेहरे के भाव ऐसे हो गए जैसे लेखक का आना अच्छा नहीं लगा। ऐसा लग रहा था जैसे लेखक ने उनके एकांत चिंतन में विघ्न डाल दिया था। इसीलिए वे परेशान हो जाते हैं। परेशानी की स्थिति में कभी खिड़की के बाहर देखते हैं और कभी खीरों को देखते हैं। उनकी असुविधा और संकोच वाली स्थिति से लेखक को लगा नहीं कि नवाब उनसे बातचीत नहीं करने में उत्सुक है।

प्रश्न 2. नवाब साहब ने बहुत ही यल से खीरा काटा, नमक-मिर्च बुरका, अंततः सूँघकर ही खिड़की से बाहर फेंक दिया। उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा ? उनका ऐसा करना उनके कैसे स्वभाव को इंगित करता है ?

उत्तर – नवाब साहब ने बहुत नजाकत और सलीके से खीरा काटा, उन पर नमक मिर्च लगाया। उन नमक-मिर्च लगी खीरे की फाँकों को खाया नहीं अपितु सूंघकर खिड़की से बाहर फेंक दिया था। उनकी इस हरकत का यह कारण होगा कि वे एक नवाब थे, जो दूसरों के सामने खीरे जैसी आम खाद्य वस्तु खाने में शर्म अनुभव करते थे। लेखक को अपने डिब्बे में देखकर नवाब को अपनी ईसी याद आने लगी। इसीलिए उन्होंने खीरे को केवल मात्र सूँघकर ही खिड़की से बाहर फेंक दिया।
नवाब साहब के ऐसा करने से ऐसा लगता है कि वे दिखावे की जिंदगी जी रहे हैं। वे दिखावा पसंद इन्सान थे। उनके इसी प्रकार के स्वभाव ने लेखक को देखकर खीरा खाना अपमान समझा।

प्रश्न 3. ‘लखनवी अंदाज’ पाठ से निहित व्यंग्य स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – ‘लखनवी अंदाज’ पाठ में निहित व्यंग्य शालीन प्रकृति का है। यह ऐसा नहीं है कि जिसे देख-सुन कर ठहाका लगा कर हंसा जा सके। उनके मन में कहीं न कहीं अपने नवाब होने की हीन भावना छिपी हुई थी और वे दूसरों के सामने साधारण से खीरे को खाने की इच्छा करके भी खा नहीं रहे थे। इसीलिए उन्होंने खीरे को अत्यंत बहुमूल्य वस्तु की तरह छोला और काटा। उसे नाक तक ले जा कर सुंघा। जिस से उनके मुँह में पानी आया। उन्होंने उस पानी को अपने भीतर गटका और खीरे की फाँक को खिड़की से बाहर फेंक दिया। इसी प्रकार पूरे खीरे को बाहर फैंकने के बाद उन्होंने गर्व से लेखक की ओर देखा और अपने झूठे अहं को संतुष्ट किया। ऐसा करके उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया कि खीरे को खानदानी रईस ऐसे ही खाते हैं।

पाठ 4 मानवीय करुणा की दिव्य चमक महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. पाठ में आए उन प्रसंगों का उल्लेख कीजिए जिनसे फ़ादर बुल्के का हिंदी प्रेम प्रकट होता है ?
अथवा
कामिल बुल्के के साहित्यिक रूप को स्पष्ट कीजिए।
अथवा
फादर कामिल बुल्के की झुंझलाहट और दुःख का क्या कारण था?

उत्तर – फ़ादर बुल्के विदेशी होते हुए भी भारतीय थे। उनको हिंदी से विशेष लगाव था। उन्होंने हिंदी में प्रयाग विश्व विद्यालय से शोध किया। फ़ादर बुल्के ने मातरलिंक के प्रसिद्ध नाटक ‘ब्लूबर्ड’ का हिंदी में ‘नील पंछी’ नाम से रूपांतर किया। उन्होंने मसीही धर्म की धार्मिक पुस्तक ‘बाइबिल’ का हिंदी में अनुवाद किया। उन्होंने अपना प्रसिद्ध अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश तैयार किया। उनके शोध रामकथा: उत्पत्ति और विकास के कुछ अध्याय ‘परिमल’ में पढ़े गए थे। उन्होंने ‘परिमल’ में भी कार्य किया। वे सदैव हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए चिंतित रहते थे। इसके लिए वे प्रत्येक मंच पर आवाज उठाते थे। उन्हें उन लोगों पर झंझलाहट होती थी जो हिंदी जानते हुए भी हिंदी का प्रयोग नहीं करते थे। इस तरह हम कह सकते हैं कि फ़ादर बुल्के का हिंदी के प्रति विशेष लगाव और प्रेम था ।

प्रश्न 2. लेखक ने फ़ादर बुल्के को ‘मानवीय करुणा की दिव्य चमक’ क्यों कहा ? ( VVI )

उत्तर – फ़ादर बुल्के का व्यक्तित्व सबसे अलग था। उनके मन में सबके लिए अपनापन था। सबके साथ होते हुए भी वे अपने व्यवहार, अपनत्व, वात्सल्य के कारण अलग दिखाई देते थे। वे सबके साथ एक-सा व्यवहार करते थे। उनका मन करुणामय था। वे सब जान-पहचान वालों के परिवारों के दुःख-सुख की पूरी जानकारी रखते थे हर किसी के दुःख में दु:खी होना तथा सुख में खुशी अनुभव करना उनका स्वभाव था। जब वे दिल्ली आते थे समय न होने पर भी सबकी खोज खबर लेकर वापिस जाते थे। जिससे रिश्ता बना लिया अपनी तरफ से उसे पूरी तरह निभाते थे। उनके व्यक्तित्व की यही बातें उन्हें ‘मानवीय करुणा की दिव्य चमक’ बनाती थीं।

प्रश्न 3. ‘मानवीय करुणा की दिव्य चमक’ पाठ का मूलभाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – ‘मानवीय करुणा की दिव्य चमक’ संस्मरण है। इसके माध्यम से लेखक ‘सर्वेश्वर दयाल सक्सेना’ फ़ादर बुल्के को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं फ़ादर बुल्के का जीवन हम भारतवासियों के लिए एक प्रेरणा है। फ़ादर बुल्के विदेशी होते हुए भी भारत, भारत की भाषा और संस्कृति से बहुत गहरे जुड़े हुए थे। उन्होंने सदैव स्वयं को एक भारतीय कहा है। उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए बहुत योगदान दिया है। हम लोगों को फ़ादर बुल्के के जीवन से यह संदेश लेना चाहिए कि जब एक विदेशी अनजान देश, अनजान लोगों और भाषा को अपना बना सकता है तो हम अपने देश, अपने लोगों और भाषा को अपना क्यों नहीं बना सकते ? हमें अपने भारतीय होने पर गर्व होना चाहिए। अपने देश और उसकी राष्ट्रभाषा हिंदी के सम्मान की रक्षा के लिए सदैव तैयार रहना चाहिए।

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