HBSE Class 12 Hindi Important Questions 2021 – आरोह भाग 2

HBSE Class 12 Hindi Important Questions and Answers for 2021 Exams. Here i added all the Important Questions of Aroh Bhag -2 from Class 12 Hindi. As you Know Haryana Board as well as other boards like CBSE Changed their Syllabus for 2021 Exams due to study is not performed well. Now HBSE changed class 12 Hindi Syllabus 2021 also . So Here i added all Important Questions after changing in Syllabus. Some Chapters has deleted so your important questions from आरोह भाग 2 is changed also. HBSE Paper Pattern is not changed more but Chapters reduced. here i Provided all the Important Questions of Class 12 Hindi 2020-21 with Chapter wise.

Class 12 Hindi Important Questions 2021 – Gadhya Bhag

पाठ 1 भक्तिन महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. भक्तिन अपना वास्तविक नाम लोगों से क्यों छिपाती थी? भक्तिन को यह नाम किसने और क्यों दिया होगा ?

उत्तर – भक्तिन का वास्तविक नाम लछमिन अर्थात् लक्ष्मी था जो समृद्धि और ऐश्वर्य का प्रतीक होता है। भक्तिन गरीब महिला थी जबकि उसका नाम लक्ष्मी था। वह धनहीन थी लेकिन इसके साथ वह बहुत समझदार भी थी। लोग उसके इस नाम को सुनकर उसकी हँसी न उड़ाएँ इसलिए वह अपना वास्तविक नाम छिपाती थी। भक्तिन को यह नाम लेखिका ने दिया था। लेखिका ने यह नाम शायद भक्तिन की सेवा भावना और कर्तव्यपरायणता े देखकर दिया होगा क्योंकि भक्तिन में एक सच्ची सेविका के संपूर्ण गुण विद्यमान थे जिस पर कोई भी स्वामी गर्व कर सकता है।

प्रश्न 2. भक्तिन द्वारा शास्त्र के प्रश्न को सुविधा से सुलझा लेने का क्या उदाहरण लेखिका ने दिया है ?

उत्तर – लेखिका ने भक्तिन द्वारा शास्त्र के प्रश्न को सुविधा से सुलझा लेने का यह उदाहरण दिया है”शास्त्र का प्रश्न भी भक्तिन अपनी सुविधा के अनुसार सुलझा लेती है। मुझे स्त्रियों का सिर घुटाना अच्छा नहीं लगता। अत: मैंने भक्तिन को रोका। उसने अंकुठित भाव से उत्तर दिया कि शास्त्र में लिखा है कुतूहलवश मैं पूछ ही बैठी-‘क्या लिखा है ?’ तुरंत उत्तर मिला-‘तीरथ गए मुंडाए सिद्ध’ कौन से शास्त्र का यह रहस्यमय सूत्र है, यह जान लेना मेरे लिए संभव ही नहीं था। अत: मैं हारकर मौन ही रही और भक्तिन का चूडाकर्म हर बृहस्पतिवार को एक दरिद्र नापित के गंगाजल से धुले अस्तुरे द्वारा यथाविधि निष्पन्न होता रहा।

प्रश्न 3. भक्तिन के आ जाने से महादेवी अधिक देहाती कैसे हो गई ?

उत्तर – भक्तिन एक देहाती अर्थात् ग्रामीण महिला थी जो अनपढ़ थी। इसलिए वह बिल्कुल देहाती भाषा का प्रयोग किया करती थी। भक्तिन एक देहाती होने के साथ-साथ समझदार भी थी। उसका स्वभाव ऐसा बन चुका था कि वह दूसरों को तो अपने मन के अनुसार बना लेती थी लेकिन अपने अंदर किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं चाहती थी। महादेवी वर्मा बार-बार प्रयास करके भी उसके स्वभाव को परिवर्तित न कर सकी। इसलिए भक्तिन के आ जाने से महादेवी अधिक देहाती हो गई।

पाठ 2 बाजार दर्शन महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. बाजार का जादू चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर क्या-क्या असर पड़ता है?

उत्तर – बाजार के जादू के चढ़ने और उतरने पर मनुष्य पर निम्नलिखित असर पड़ता है
(i) बाजार का जादू चढ़ने पर मनुष्य उसकी ओर उसी प्रकार से खींचा चला जाता है जिस प्रकार चुंबक लोहे की ओर खींचा चला जाता है।
(ii) अनेक वस्तुओं का निमंत्रण मनुष्य तक अपने आप पहुँच जाता है जिन्हें वह खरीदने हेतु लालायित हो उठता है। (iii) मनुष्य को सभी सामान जरूरी और आरामदायक प्रतीत होता है।
(iv) मनुष्य को जिस वस्तु की आवश्यकता भी न हो उसे भी वह खरीदने पर मजबूर हो जाता है।
(v) बाजार का जादू उतरने पर मनुष्य को आभास होता है कि जो आरामदायक फैसी वस्तुएँ उसने खरीदी थीं वे सब आराम देने की अपेक्षा उसे दुःख पहुंचाती हैं।
(vi) वस्तुओं की उपयोगिता का पता चलने पर मनुष्य के स्वाभिमान को ठेस पहुँचती है।
(vii) बहुतायत वस्तुएं खरीदने पर मनुष्य स्वयं अपराधी महसूस करने लगता है।

प्रश्न 2. ‘बाजारूपन’ से क्या तात्पर्य है ? किस प्रकार के व्यक्ति बाज़ार को सार्थकता प्रदान करते हैं अथवा बाज़ार की सार्थकता किस में है ?

उत्तर – बाज़ारूपन से तात्पर्य कपट बढ़ाने से है अर्थात् सद्भाव की कमी। सद्भाव की कमी के कारण आदमी परस्पर भाई, मित्र और पड़ोसी आदि को भूल जाता है। मनुष्य केवल सब के साथ कोरे ग्राहक जैसा व्यवहार करता है। उसे कोई भाई, मित्र या पड़ोसी दिखाई नहीं देता है। बाजारूपन के कारण मनुष्य को केवल अपना लाभ-हानि ही दिखाई देता है। इस भावना से शोषण भी होने लगता है। जो व्यक्ति ये जानते हैं कि वे क्या चाहते हैं उन्हें किस वस्तु की आवश्यकता है ऐसे व्यक्ति ही बाज़ार को सार्थकता प्रदान कर सकते हैं। ये लोग कभी भी पर्चेज़िंग पावर’ के गर्व में नहीं डूबते। इन्हीं लोगों को अपनी चाहत का अहसास होता है जिसके आधार पर किए के सार्थकता प्रदान होती है।

प्रश्न 3. ‘बाजार दर्शन’ पाठ का मूलभाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – ‘बाजार दर्शन’ श्री जैनेंद्र कुमार द्वारा रचित एक महत्त्वपूर्ण निबंध है जिसमें गहन वैचारिकता और साहित्य सुलभ लालित्य का मणिकांचन संयोग देखा जा सकता है। यह निबंध उपभोक्तावाद एवम् बाजारवाद की मूल अंतर वस्तु को समझाने में बेजोड़ है। जैनेंद्र जी ने इस निबंध के माध्यम से अपने परिचित एवं मित्रों से जुड़े अनुभवों के माध्यम से चित्रित किया है कि बाजार की जादुई ताकत कैसे हमें अपना गुलाम बना लेती है। उन्होंने यह भी बताया है कि अगर हम आवश्यकतानुसार बाजार का सदुपयोग करें तो उसका लाभ उठा सकते हैं लेकिन हम जरूरत से दूर बाजार की चमक-दमक में फैस गए तो वह असंतोष, तृष्णा और ईर्ष्या से घायल कर हमें सदा के लिए बेकार बना सकता है। लेखक ने बाजार का पोषण करने वाले अर्थशास्त्र को अनीतिशास्त्र की संज्ञा दी है।

पाठ 3 काले मेघा पानी दे महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. लोगों ने लड़कों की टोली को मेंढक मंडली नाम किस आधार पर दिया ? यह टोली अपने आपको इंदर सेना कहकर क्यों बुलाती थी ?

उत्तर – लड़के समूह में एकत्रित होकर नंगे शरीर उछलते-कुदते तथा अत्यधिक शोर-शराबा करते हुए गलियों में कीचड़ करते हुए घूमते थे। ये गलियों में इधर-उधर दौड़ा करते थे इसी आधार पर लोगों ने लड़कों को मेंढक मंडली गाम दे दिया था। यह टोली अपने आपको इंदर सेना इसलिए कहकर पुकारती क्योंकि यह अनावृष्टि से छुटकारा पाने लोक-आस्था के कारण इंद्र महाराज को खुश करने के लिए ऐसा कार्य करती थी। इनका मानना था कि हमारे इसी हेतु
कार्य से प्रसन्न होकर इंद्र देवता काले मेघा लेकर वर्षा करेंगे जिससे गाँव, शहर खेत खलिहान खिल उठेंगे।

प्रश्न 2. जीजी ने इंदर सेना पर पानी फेंके जाने को किस तरह सही ठहराया ?

उत्तर – जीजी ने कहा कि यदि हम इंदर सेना पर पानी नहीं फेंकेगे तो इंद्र भगवान् हमें पानी कैसे देंगे ? यह पानी की बर्बादी नहीं है बल्कि यह तो पानी का अर्घ्य है जिसे हम कुछ पानी की चाह लेकर चढ़ाते हैं। मनुष्य जिस वस्तु को दान में नहीं देगा तो फिर कैसे जाएगा ? संसार में ऋषि मुनियों ने दान को सर्वोत्तम बताया है। बिना त्याग दान नहीं होता। त्याग भावना से जो दान दिया जाता है उसी से फल की प्राप्ति होती है। जिस प्रकार किसान तीस-चालीस मन गेहूँ की पैदावार के लिए पहले अपने खेत में पांच-छः सेर अच्छे गेहूँ की बुवाई करता है।

प्रश्न 3. ‘पानी दे, गुड़धानी दे’ मेघों से पानी के साथ-साथ गुड़धानी की माँग क्यों की जा रही है ?

उत्तर – अनावृष्टि के कारण चारों ओर सूखा छा जाता। शहर की अपेक्षा गाँव की हालत खराब हो जाती है। कृषि योग्य भूमि सूखकर पत्थर हो जाती है। जमीन फटने लगती है। लू के कारण पशु प्यासे मरने लगते हैं। मेघों से वर्षा होकर ही सूखी भूमि फिर से ही कृषि योग्य बन जाए फ़सलें लहलाने लगेगी। अनाज की पैदावार होगी तथा पशु भी प्यासे नहीं मरेंगे। दूध अच्छी प्रकार से देंगे। जिनसे धन्य-धान्य की प्राप्ति होगी। चारों तरफ खुशहाली फैल जाएगी। सबको खाने-पीने को भरपूर सामग्री मिलेगी। इसीलिए मेघों के साथ-साथ गुड़धानी की मांग की जा रही है।

प्रश्न 4. गगरी फूटी बैल पियासा इंद्र सेना के इस खेलगीत में बैलों के प्यासा रहने की बात क्यों मुखरित हुई है?

उत्तर – गगरी फूटी बैल पियासा इंदर सेना के इस खेलगीत में बैलों के प्यासा रहने की बात इसलिए मुखरित हुई है क्योंकि अनावृष्टि के कारण चारों तरफ सूखा पड़ जाता है। कुएँ, तालाब पानी से सूख जाते हैं। कहीं पानी का नामोनिशान नहीं रहता। पीने का पानी बिल्कुल नहीं रहता। जिससे पशु-पक्षी प्यास के कारण व्याकुल होकर मरने लगते हैं।

प्रश्न 5. काले मेघा पानी दे संस्मरण का मूल भाव स्पष्ट कीजिए।
अथवा
‘काले मेघा पानी दे’ पाठ का प्रतिपाद्य दीजिए।
अथवा
‘काले मेघा पानी दे’ संस्मरण के माध्यम से लेखक क्या कहना चाहते हैं ?

उत्तर – ‘काले मेघा पानी दे’ संस्मरण धर्मवीर भारती द्वारा लिखित है। इसमें लेखक ने लोक आस्था और विज्ञान के द्वंद्व का सुंदर चित्रण किया है। विज्ञान का अपना तर्क है और विश्वास की अपनी सामर्थ्य । लेखक ने किशोर जीवन के इस संस्मरण में दिखलाया है कि अनावृष्टि से मुक्त पाने हेतु गाँव के बच्चों की इंदर सेना द्वार द्वार पानी माँगने जाती है। लेकिन लेखक का तर्कशील किशोर मन भीषण सूखे में उसे पानी की निर्मम बर्बादी समझता है। लेखक की जीजी इस कार्य को अंधविश्वास न मानकर लोक आस्था त्याग त्याग की भावना कहती है। लेखक बार-बार अपनी जीजी के तर्को का खंडन करता हुआ इसे पाखंड और अंधविश्वास कहता है लेकिन जीजी की संतुष्टि और अपने सद्भाव को बचाए रखने के लिए वह तमाम रीति-रिवाजों को ऊपरी तौर पर सही मानता है लेकिन अंतर्मन से उनका खंडन करता चलता है। पाठ के अंत में लेखक ने देशभक्ति का परिचय देते हुए देश में फैले भ्रष्टाचार के प्रति गहन चिंता व्यक्त की है तथा उन लोगों के प्रति कटाक्ष किया है जो आज भी पश्चिमी संस्कृति और भाषा के अधीन है तथा भ्रष्टाचार को अनदेखा कर रहे हैं।

पाठ 4 पहलवान की ढोलक महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. लुट्टन पहलवान ने ऐसा क्यों कहा होगा कि मेरा गुरु कोई पहलवान नहीं यह ढोल है ?

उत्तर – लुट्टन सिंह पहलवान ने ऐसा इसलिए कहा होगा कि उसका गुरु कोई पहलवान नहीं यही ढोल है क्योंकि उन्होंने किसी पहलवान से कोई दाँव पेच नहीं सीखे थे और न ही उसका लक्ष्य एक पहलवान बनना था। वह तो बचपन में गाय चराता हुआ गायों की धार का गर्म दूध पीया करता था। इसी से शरीर से हट्टा-कट्टा हो गया था। वह लोगों से बदला लेने के लिए कसरतें किया करता था। जब श्यामनगर में वह मेला देखने गया तो वहाँ के दंगल में ढोल बज रहा था पहलवान कुश्ती कर रहे थे। तो अचानक ही पहलवान से लड़ने हेतु, अखाड़े में कूद पड़ा और अंत में उसने निरंतर ढोल से प्रेरणा लेते हुए उस प्रसिद्ध चाँद सिंह पहलवान को हरा दिया।

प्रश्न 2. गाँव में महामारी फैलने और बेटों के देहांत के बावजूद लुट्टन पहलवान ढोल क्यों बजाता रहा ?

उत्तर – गाँव में महामारी फैलने तथा बेटों के देहांत के बावजूद भी लुट्टन सिंह पहलवान ढोल इसलिए बजाता रहा क्योंकि जब गाँव में महामारी फैली तो सारा गाँव हैजे और मलेरिये से ग्रस्त था। गाँव में चारों ओर हाहाकार मचा हुआ र के घर खाली हो गए थे। रात्रि की विभीषिका में चारों ओर सन्नाटा छा जाता था उसी रात्रि की विभीषिका तोड़ने तथा लोगों में जीने की उमंग पैदा करने के लिए वह ढोल बजाता था। जब उसके दोनों बेटे क्रूर काल की चपेट में आ गए तो वे असह वेदना सेबिलखते हुए अपने चाचा को कहने लगे कि बाबा ! उठा-पटक दो वाला ताल बजाओ अर्थात् चटाक-चट-धा, चटाक-चट धा ताल बजाओ। जिसे वह सारी র बजाता रहा। सुबह होते ही उसके दोनों बेटे मृत्यु को प्राप्त हो गए। अतः अपने बेटों की अंतिम इच्छा को पूर्ण करने के लिए बेटों के देहांत के बावजूद भी लुट्टन सिंह पहलवान ढोल बजाता रहा।

प्रश्न 3. ढोलक की आवाज़ का पूरे गाँव पर क्या असर होता था ?

उत्तर – ढोलक की आवाज़ पूरे गाँव वालों में धैर्य, साहस और स्फूर्ति प्रदान करती थी। रात्रि की विभीषिका में तथा सन्नाटे को ललकार के सामने चुनौती पैदा कर देती थी। जब पूरा गाँव महामारी के कारण मलेरिये और हैजे से त्रस्त होकर अधमरा, निर्बल और निस्तेज हो गया था तब इस भयंकर वातावरण में ढोलक की आवाज़ गाँव वालों को संजीवनी प्रदान किया करती थी। उपचाराधीन और पथविहीन लोगों में संजीवनी शक्ति भरती थी। बच्चे, जवान और बूढ़ों की आँखों के आगे दंगल का दृश्य पैदा कर देती थी। ढोल की आवाज सुनकर शक्तिहीन शिराओं में बिजली सी दौड़ पड़ती थी। मरते हुए प्राणियों को भी आँख मूँदते समय कोई तकलीफ नहीं होती थी लोग मृत्यु से भी नहीं डरते थे। इसे सुनकर लोगों के मन में जीने की नई उमंग जागृत हो जाती थी।

प्रश्न 4. महामारी फैलने के बाद गांव में सूर्योदय और सूर्यास्त के दृश्य में क्या अंतर होता था ?

उत्तर – सूर्योदय दृश्य-महामारी फैलने के बाद गाँव में सूर्योदय होते ही रोते-चिल्लाते, दुःखी होते हुए अपने अपने घरों से बाहर निकलते थे वे महामारी की भेंट चढ रहे पड़ोसियों और परिचित लोगों के घर-घर जाकर ढांदस देते थे। जिस माँ का बच्चा मलेरिये और हैजे का शिकार हो जाता तथा किसी का पति मर जाता तो गाँव वाले उनको धैर्य देने का प्रयास करते थे। घर में पड़े मुद्दों को बिना कफ़न में ही नदी की भेंट चढ़ा दिया करते थे।
सूर्यास्त दृश्य-गाँव में सूर्यास्त होते ही रात्रि की विभीषिका चारो ओर अपना साम्राज्य स्थापित कर लेती थी। सब तरफ सन्नाटा छा जाता था। गाँव के लोग भयभीत होकर अपनी-अपनी झोंपड़ियों में घुस जाते थे। रात्रि के गहन अंधकार में झोंपड़ियों से बोलने तक की भी आवाज बाहर नहीं आती थी, यहाँ तक कि रात की विभीषिका के कारण उनके बोलने की शक्ति भी क्षीण हो जाती थी। यदि समीप किसी माँ का बेटा मर जाता था तो उसे अंतिम बार माताओं को बेटे कहने की भी किसी में हिम्मत भी नहीं होती थी। केवल रात्रि की इस विभीषिका को पहलवान की ढोलक चुनौती देती रहती थी। वह सारी रात उसको बजाता रहता था। यही ढोलक की आवाज़ इन अधमरे पथविहीन गाँव वालों में संजीवनी देने का कार्य करती थी। इसी आवाज से उनकी शक्तिहीन शिराओं में बिजली सी दौड़ जाती थी।

पाठ 6 नमक महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. सफ़िया के भाई ने नमक की पुड़िया ले जाने से क्यों मना कर दिया?

उत्तर – सफ़िया के भाई ने नमक की पुडिया ले जाने से इसलिए मना कर दिया क्योंकि नमक पाकिस्तान से सरहद पार हिंदुस्तान ले जाना गैर-कानूनी था। फिर उसे वह नमक लेकर जहाँ से जाना था वहाँ कस्टम अधिकारी उसे पकड़ लेते। जिससे सफ़िया के साथ-साथ उसकी तथा उसके परिवार की भी बेइज्जती हो जाती।

प्रश्न 2. नमक की पुड़िया ले जाने के संबंध में सफ़िया के मन में क्या द्वंदव था?

उत्तर – सफ़िया को सुबह ही पाकिस्तान से रवाना होना था इसलिए उसे रात को सामान की पैकिंग करनी थी। सारी चीजें समेटकर सूटकेस और बिस्तरबंद में बंध गई। केवल कीनू की एक टोकरी तथा नमक की पुड़िया रह गईं. थी। इसलिए वह सोच रही थी कि नमक की इस पुड़िया को वह कैसे ले जाएगी। अगर इसे हाथ मे ले लें और कस्टम वालों के सामने सबसे पहले इसी को रख दे लेकिन अगर कस्टम वालों ने नहीं जाने दिया तो मजबूरी में हम छीड़ देंगे। लेकिन फिर उस वायदे का क्या होगा, जो हमने अपनी माँ से किया है। जान देकर भी वायदा पूरा करना होगा। यह सोचने लगी यदि इस पुड़िया को कौतुओं की टोकरी में रख लिया जाए तो इतने कीनुओं के देर में भला इसे कौन देख पाएगा? और अगर देख लिया यह चितित होने लगी। दूसरे ही सण यह सोचने लगी नहीं, फलों की टोकरियाँ तो आते समय भी किसी को नहीं देखी आ रही थी। हिंदुस्तान से केले तथा पाकिस्तान से कीनू सब ऐसे ही ले जा रहे थे । ऐसा चितन करके उसने ऐसा ही उचित समझा।

प्रश्न 3. नमक ले जाने के बारे में सफ़िया के मन में उठे दयंदवों के आधार पर उसकी चारित्रिक विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – नमक ले जाने के बारे में सफ़िया के मन में ठठे द्वंद्यों के आधार पर ठसकी चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं-
(i) प्रखर वक्ता- सफ़िया एक साहित्यकार थी। इसलिए वह बातचीत करने में तनिक भी संकोच नहीं करती थी। वह बहस करने में पूर्ण समर्थ थी। नमक ले जाने के बारे में उसका भाई बार-बार उसे समझाकर हार जाता है और उसे कहना पड़ता है कि अब आपसे बहस कौन कर सकता है। इस प्रकार सफ़िया एक प्रखर वक्ता थी।
‌(ii) निडर – यह अत्यंत निडर थी। अपने भाई के बार-बार डराने पर भी वह कस्टमवालों से नहीं डरती। वह अमृतसर के कस्टम अधिकारियों के समक्ष अपने आप ही निडरता से कहती है- “देखिए मेरे पास नमक है, थोड़ा सा।”
(iii) साहित्यकार- सफ़िया एक श्रेष्ठ साहित्यकार थी। उसका साहित्यकार होना हमें उसके भाई के संवादों से पता चलता है। उसके संवादों से हमें पता लगता है कि उसमें श्रेष्ठ प्रतिभा है। वह कहता है ” अब आपसे कौन बहस करे। आप अदीब ठहरीं और सभी अदीबों का दिमाग थोड़ा-सा तो जरूर ही घूमा हुआ होता है।”
(iv) ईमानदार- सफ़िया एक ईमानदार नारी है जब सफ़िया का भाई उसे कहता है कि उसे नमक लेकर सरहद से गुजरना होगा जहाँ कस्टम वाले उसे पकड़ लेंगे तो वहाँ उसकी ईमानदारी का परिचय मिलता है। वह कहती है, निकल आने का क्या मतलब, मैं क्या चोरी से ले जाऊँगी? छिपा के ले जाऊँगी? मैं तो दिखा के ले जाऊँगी?”
(v) इनसानियत-सफ़िया एक ऐसी इनसान है जिसमें इनसानियत का गुण कूट-कूट कर भरा है। वह सरहदों को देखकर अत्यंत चिंता में पड़ जाती है कि जब दोनों ओर के व्यक्ति ‘पहनावा’ बोलने के अंदाज एक हैं जब जमीन एक है तो फिर ये दो कैसे बने ? इस उदाहरण से उसकी इनसानियत स्वतः ही स्पष्ट हो जाती है-” अरे, फिर वही कानून कानून कहे जाते हो क्या सब कानून हुकूमत में ही होते हैं। कुछ मुहब्बत, मुरीवत, आटमियत, इनसानियत के नहीं होते आखिर कस्टम वाले भी इंसान होते हैं। कोई मशीन तो नहीं होते। ”
(vi)दृढ़ निश्चयी- सफ़िया दृढ़ निश्चयी नारी है। उसने नमक लेकर आने का दृढ़ निश्चय किया था जिसे उसने पूर्णत: निभाया और वह अनेक मुसीबतों का सामना करते हुए सरहद के पास और-कानूनी होते हुए भी नमक की पुड़िया से आई थी।

प्रश्न 4. ‘नमक’ का मूलभाव स्पष्ट कीजिए।

उत्तर – मानचित्र पर एक लकीर खींच देने से जमीन और जनता को कागजी रूप में तो बांटा जा सकता है। लेकिन वास्तविक रूप में नहीं। यह सत्य है कि जमीन को चाहकर भी नहीं बांटा जा सकता और न ही कोई जनता के हदय को भावनाओं को दबा सकता है। मानचित्र पर खींची गई लकीर जनता के अंतर्मन तक नहीं पहुँच पाती क्योंकि जनता को कोई शारीरिक रूप से विभक्त कर सकता है, लेकिन मानसिक और आत्मिक रूप से उसे नहीं बांट सकता। जैसे सफ़िया को पाकिस्तानी कस्टम अधिकारी का यह कथन कि मेरा वतन दिल्ली है, आप भी तो हमारी ही तरफ की मालूम होती हैं और अपने अजीजों से मिलने आई होंगी
जब सफ़िया पाकिस्तान से नमक लेकर चली तो कस्टम अधिकारी ने कहा कि जामा मस्जिद की सीढ़ियों को मेरा सलाम कहिएगा और उन खातून को यह नमक देते वक्त मेरी तरफ से कहिएगा कि “लाहौर अभी तक उनका वतन है और देहली मेरा तो बाकी सब रफ्ता-रफ्ता ठीक हो जाएगा”।
भारत-पाक विभाजन के इतने वर्षों बाद भी ये पाकिस्तानी और हिंदुस्तानी व्यक्ति अपनी जन्मभूमि से हृदय से प्यार करते हैं। आज भी वे इस जमीन और लोगों के दिलों से दूर नहीं हो पाए। इसी प्रकार सफ़िया को अमृतसर में भारतीय कस्टम अधिकारी ने कहा-हाँ मेरा वतन ढाका है “जब डिवीजन हुआ तभी आए, मगर हमारा वतन ढाका है। मैं तो कोई बारह-तेरह साल का था। पर नजरूल और टैगोर को तो हम लोग बचपन से पढ़ते थे जिस दिन हम रात को यहाँ आ रहे थे उसके ठीक एक वर्ष पहले मेरे सबसे पुराने सबसे प्यारे, बचपन के दोस्त ने मुझे यह किताब दी थी। उस दिन मेरी साल गिरह थी फिर हम कलकत्ता रहे, पढ़े, नौकरी भी मिल गई, पर हम वतन आते जाते थे।”

पाठ 8 (i)विभाजन और जाति प्रथा (ii) मेरी कल्पना का आदर्श समाज महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

प्रश्न 1. जाति प्रथा को श्रम-विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे आंबेडकर के क्या तर्क हैं?

उत्तर – जाति प्रथा को श्रम विभाजन का ही एक रूप न मानने के पीछे आंबेडकर के निम्नलिखित तर्क हैं-
(i) जाति प्रथा श्रम विभाजन के साथ-साथ श्रमिक विभाजन का रूप लिए हुए है।
(ii) श्रम-विभाजन निश्चय ही सभ्य समाज की आवश्यकता है, परंतु किसी भी सभ्य समाज में श्रम-विभाजन की व्यवस्था श्रमिकों का विभिन्न वर्गों में अस्वाभाविक विभाजन नहीं करती।
(iii) भारत की जाति-प्रथा श्रमिकों का अस्वाभाविक विभाजन ही नहीं करती, बल्कि विभाजित विभिन्न वर्गों को
एक-दूसरे की अपेक्षा ऊँच-नीच भी करार देती है, जो कि विश्व के किसी भी समाज में नहीं पाया जाता।
(a) जाति-प्रथा को याद कर-विभाजन मान लिया जाए तो यह स्वाभाविक विभाजन नहीं है, क्योंकि यह मनुष्य की कच आधान्ति नहीं है।

प्रश्न 2. लेखक के से दासता की व्यापक परिभाषा क्या है?

उत्तर – लेखक के अनुसार दासता से अभिप्राय केवल कानूनी पराधीनता से नहीं है, बल्कि दासता में वह स्थिति भी मामला है जिसमे कुछ व्यक्तियों को दूसरे लोगों द्वारा निर्धारित व्यवहार एवं कर्तव्यों का पालन करने के लिए विक्या होना पड़ता है। यह स्थिति कानूनी पराधीनता न होने पर भी पाई जा सकती है।

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