मानवीय करुणा की दिव्य चमक Class 10 Hindi Summary – क्षितिज भाग 2 NCERT Solution

NCERT Solution of Class 10 Hindi क्षितिज भाग 2  मानवीय करुणा की दिव्य चमक पाठ का सार for Various Board Students such as CBSE, HBSE, Mp Board,  Up Board, RBSE and Some other state Boards. We also Provides पाठ का सार और महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर for score Higher in Exams.

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NCERT Solution of Class 10th Hindi Kshitij bhag 2/  क्षितिज भाग 2 Manviya Karuna Ki Divya Chamak / मानवीय करुणा की दिव्य चमक Summary / पाठ का सार Solution.

मानवीय करुणा की दिव्य चमक Class 10 Hindi  पाठ का सार ( Summary )

मानवीय करुणा की दिव्य चमक एक संस्मरण है जो सर्वेश्वर दयाल सक्सेना के द्वारा लिखा गया है। इसमें लेखक फादर कामिल बुल्के की चारित्रिक विशेषताओं का वर्णन करते हैं।

फादर बुल्के का जन्म रेम्स चैपल, बेल्जियम में हुआ था लेकिन वे अपने आप को भारतीय कहते थे। फादर कामिल का गोरा रंग, सफेद दाढ़ी और नीली आंखें थी।उनकी मृत्यु जहरबाद के कारण हुई। लेखक फादर बुल्के को 35 सालों से जानते थे। उनको देखना करुणा के निर्मल जल में स्नान करने जैसा था। परिमल पत्रिका के द्वारा लेखक की फादर से भेंट हुई और धीरे-धीरे वे उनसे पारिवारिक रिश्ते में बंद करें। लेखक अक्सर सोचते कि फादर बेल्जियम में इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष की पढ़ाई छोड़ कर सन्यासी क्यों बन गए जबकि उनका घर भरा पूरा था जिसमें दो भाई, एक बहन, माता-पिता सभी थे‌। फादर को मां की याद अक्सर आया करती थी। उनकी मां अक्सर उनको चिट्ठी भी भेजा करती थी। उन चिट्ठियों को वह अपने अभिन्न मित्र डॉक्टर रघुवंश को दिखाते थे। एक दो बार अपनी मां से मिलने बेल्जियम भी गए थे। उनको अपनी बहन के विवाह की भी चिंता रहती थी। फिर वह कहते हैं कि मैं तो सन्यासी हूं। मां ने बचपन में ही घोषित कर दिया था कि लड़का हाथ से निकल गया है और मैंने भी इंजीनियरिंग की अंतिम पढ़ाई छोड़ कर सन्यास ले लिया और एक शर्त रखी कि मैं भारत जाऊंगा। उसके बाद में भारत आ गया। नौ-दस साल दार्जिलिंग में पढ़ता रहा। उसके बाद कोलकाता से b.a. और इलाहाबाद से m.a. की। 1950 में उन्होंने ‘रामकथा : उत्पत्ति और विकास’ की रचना की। फादर ने प्रसिद्ध नाटक ब्लू बर्ड का रूपांतर नील पंछी के नाम से किया। वे 47 वर्षों तक देश में रहे और 73 वर्षों तक जिंदगी जी।

फादर संकल्प से सन्यासी थे लेकिन मन से सन्यासी नहीं थे वे जब किसी से रिश्ता बनाते तो तोड़ते नहीं थे। जब भी वे दिल्ली आते तो लेखक से जरूर मिलते थे। उनकी चिंता हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में देखने की थी। जब भी वे किसी से मिलते तो उनसे उनके घर परिवार के बारे में निजी सुख-दुख ओ के बारे में जरूर पूछते थे। उनके शब्द मनुष्य के मन में आशा उत्पन्न करते थे।

लेखक को इस बात का दुख है कि फादर बुल्के आज जिंदा नहीं है और जब वे दिल्ली में बीमार रहे तब लेखक को पता भी नहीं चला। उनकी मृत्यु 4 अगस्त 1982 की सुबह 10:00 बजे हुई। उनका ताबूत दिल्ली में कश्मीरी गेट के निकल सन कब्रगाह मैं एक छोटी सी नीली गाड़ी से उतारा। उनके साथ उनके मित्र कुछ पादरी और कुछ परिजन भी थे। इस अवसर पर फादर पास्कल ने उन्हें श्रद्धांजलि दी और कहा कि “फादर बुल्के धरती में जा रहे हैं इसी धरती से ऐसे और रतन पैदा हो”।

अंत में लेखक कहते हैं कि मैं नहीं जानता कि इस सन्यासी ने कभी सोचा होगा कि इसकी मृत्यु पर कोई रोयेगा लेकिन उस समय वहां रोने वालों की कमी नहीं थी। हमारे बीच से वह चला गया जो हम में से सबसे अधिक छायादार फल फूल गंज से भरा और सबसे अलग था। उनकी समृति हमारे जीवन में हमेशा बनी रहेगी और अंत में लेखक फादर बुल्के को श्रद्धानत होकर नमस्कार करता है।

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